कश्यप राजपूत क्षत्रिय








 1 Book name - कश्यप राजपूत क्षत्रिय -  आज के दौर में जिस प्रकार झींवर, धींवर आदि समुदाय संगठित करने का प्रयत्न जारी है इसी प्रकार पहले भी महापुरुषों द्वारा कश्यप नाम से इन्हें संगठित करने का प्रयत्न किया प्रतीत होता है। इस विषय में कहते हैं कि किसी समय महाऋषि कण्व मिश्र देश गये थे जहां बहुत से प्राचीन क्षत्री, वैश्य क्रिया विहीन हुए शूद्रों से भी निम्न मलेच्छ आदि हुए बैठे थे। वहां उन्होंने भारतीय प्राचीन धर्म एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया जिसके फलस्वरूप उनके साथ दस सहंस्त्र शिष्य भारतीय शिक्षा प्राप्त करने भारत आये थे और वह धींवर, झींवर आदि भारतीय जातियों में मिलके कश्यप वंशी काश्यपूत कहलाये थे। जिसका कुछ वृतान्त भविष्य पुराण (भाग एक) में मिलता है, इस विषय का किसी महानुभाव द्वारा भेजा गया श्लोक :


कश्यप, कण्व विप्र ऋषि मिश्र देश: गतो पुरा।

कथं कुरुवन्तु कारुका झीवर बाढ़ी तक्षक। ।।

दशः सहतन्त्र एवं दितया च भारतीय भाषा शिक्षायेन। धींवरे मेल दित्या च तस्मात् कश्यप स्मृत्यन्।।


2 Book name - भविष्य पुराण - सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिस्स्रदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छोंको संस्कृत पढ़ाकर अपने वशमें कर लिया तथा स्वयं श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें आ गये। उन लोगोंने सरस्वतीदेवीको तपस्यासे संतुष्ट किया। पाँच वर्षके बाद सरस्वतीदेवी प्रकट हुईं और सपत्नीक उन म्लेच्छोंको शूद्रवर्णका बना दिया। वे सब कारुवृत्ति करनेवाले (शिल्पी) अनेक पुत्रोंसे समन्वित हुए। उनके मध्यमें दो हजार वैश्य हुए। उनके मध्यमें आचार्य पृथु नामका कश्यपसेवक था। उसने बारह वर्षतक तपस्याद्वारा महामुनिको संतुष्ट किया। महर्षि कण्वने प्रसन्न हो देवताओंके वरसे उन्हें क्षत्रिय राजा बनाया और उन्हें राजपुत्रपुर प्रदान किया। राजन्या नामकी उनकी पत्नीने मागध नामक पुत्रको जन्म दिया। उनको कण्वने पूर्व दिशामें मागध देश दिया। तदनन्तर कश्यपपुत्र काश्यप स्वर्गलोक चले गये। उनके स्वर्ग चले जानेपर शूद्रवर्णवाले उन म्लेच्छोंने यज्ञोंद्वारा देवाधिदेव शचीपति इन्द्रकी अर्चना की। इससे दुःखी होकर इन्द्र अपने बन्धुके साथ अपने अंशसे पुनः ब्रह्मयोनिमें पृथ्वीमें उत्पन्न हुए


3 Book name - अग्नि पुराण - फिर वे कामधेनुको साथ लेकर अपने आश्रमपर लौट आये। एक दिन परशुरामजी जब वनमें गये हुए थे, कृतवीर्यके पुत्रोंने आकर अपने पिताके वैरका बदला लेनेके लिये जमदग्नि मुनिको मार डाला। जब परशुरामजी लौटकर आये तो पिताको मारा गया देख उनके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने इक्कीस बार समस्त भूमण्डलके क्षत्रियोंका संहार किया। फिर कुरुक्षेत्रमें पाँच कुण्ड बनाकर वहीं उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया और सारी पृथ्वी कश्यप-मुनिको दान देकर वे महेन्द्र पर्वतपर रहने लगे। इस प्रकार कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन तथा परशुराम अवतारकी कथा सुनकर मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता


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