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Showing posts from December, 2025

बाबा मोती मेहरा( कश्यप) जी

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  बाबा मोती मेहरा( कश्यप) जी  3 जनवरी 1705 शहीद बाबा मोतीराम मेहरा को औरंगजेब के किलेदार वजीर खान ने परिवार सहित कोल्हू में पीसा था बाबा मोतीराम मेहरा । जिनका वर्णन हर सिक्ख ग्रंथ में है । इन्हे सरहिन्द के किलेदार वजीर खान ने परिवार सहित जिन्दा कोल्हू में पीसा था ।   इनकी वीरता और बलिदान का उल्लेख बंदा बैरागी ने किया था । और इनकी स्मृति में एक गुरुद्वारा फतेहगढ़ में बना है । बाबा मोतीराम मेहरा के चाचा हिम्मत राय गुरु गोविन्द सिंह जी के पंच प्यारों में से एक थे सिक्ख बनकर उनका नाम हिम्मत सिंह हुआ ।  इनके पूर्वज जगन्नाथ पुरी उड़ीसा के रहने वाले थे । समय के साथ पंजाब आये और सरहिन्द में नौकरी कर ली । बाबा मोतीराम जी के पिता हरिराम कैदखाने की रसोई घर के इंचार्ज थे । दिसम्बर 1704 के अंतिम सप्ताह गुरु गोविन्द सिंह के चारों साहबजादे शहीद हुये थे । वह 27 दिसंबर 1704 की तिथि थी जब दो दिन की यातनाएं देकर गुरुजी को दो छोटे साहबजादों को जिन्दा दीवार में चुनवाया गया था । और गुरुजी माता गूजरी को अमानवीय यातनायें दी गयीं । वे भी शहीद हुईं । बाबा मोतीराम का अपराध यह था कि दिसम्ब...

कहार–धीवर–घारुक समुदाय: इतिहास, परंपरा और उपभेदों का प्राचीन दस्तावेज़ी स्वरूप

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  कहार–धीवर–घारुक समुदाय: इतिहास, परंपरा और उपभेदों का प्राचीन दस्तावेज़ी स्वरूप भारतीय समाज में जल-सम्बंधित कार्यों, नदी-घाटों और ऐतिहासिक पूजा-परंपराओं से जुड़े कई समुदाय हैं। इनमें कहार, धीवर, और उनकी उपजातियाँ—जैसे घारुक—विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पुराने अंग्रेज़ी राजकाल के दस्तावेज़ों से लेकर हिंदी जाति-ग्रंथों तक, इन समुदायों का विवरण कई स्थानों पर मिलता है। इन स्रोतों को पढ़ने पर एक समृद्ध, प्राचीन और अत्यंत रोचक इतिहास सामने आता है। ⸻ 1. अंग्रेज़ी स्रोत: “Kahár = Dhiwar” और जल-देवता की मान्यता पहली ऐतिहासिक पुस्तक (ब्रिटिश काल का जाति-विवरण) स्पष्ट रूप से कहती है कि:  • कहार (Kahár) का समानार्थक शब्द धीवर (Dhiwar) है।  • फरीदकोट, महरा आदि क्षेत्रों में कहार-समुदाय के लोग सभी सामाजिक निर्णय अपनी जाति पंचायत (rancháyat) में करते थे।  • मुस्लिम कहारों में भी पानी के देवता “ख्वाजा ख़िज़्र” की पूजा की परंपरा बची हुई थी।  • दिलचस्प बात यह है कि धीवरों में भी वही परंपरा मिलती है, यानी कहार और धीवर दोनों में जल-देवता का सांस्कृतिक प्रभाव समान रूप से था। ख्वाजा ...

गुजराती भोई समुदाय : इतिहास, पहचाना और परंपरा का अनोखा संगम

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  गुजराती भोई समुदाय : इतिहास, पहचाना और परंपरा का अनोखा संगम भारत की विविध जातीय और सामाजिक संरचना में गुजराती भोई समुदाय एक ऐसा समूह है, जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान, परंपराएँ और जीवन-शैली है। दिलचस्प बात यह है कि यह समुदाय स्वयं को राजपूत मूल का मानता है और मान्यता है कि उनके पूर्वज लखनऊ क्षेत्र से आकर गुजरात में बसे। समय के साथ उनकी संस्कृति में स्थानीय गुजराती रंग भी घुलते गए, लेकिन अपनी जड़ों की पहचान आज भी उनके रीति-रिवाजों और जीवन शैली में दिखाई देती है। ⸻ नौ उपजातियों में बटा एक समुदाय गुजराती भोई समाज कई उपसमूहों में विभाजित है, जिन्हें वे अपनी पारंपरिक नौ उपजातियाँ कहते हैं। ये हैं:  1. बकोरिया  2. भवटा  3. गधेडिया  4. गुडिया  5. कर  6. मच्छी या धीमर  7. माली  8. भेला  9. पुरबिया इन सभी उपजातियों की अपनी सामाजिक भूमिका, परंपराएँ और पारिवारिक नियम हैं। लेकिन समाज की एकता इन विविधताओं को खूबसूरती से जोड़ती है। ⸻ रोटी-बेटी के संबंध: सामाजिक नियमों की अनोखी बुनावट भारत के कई समुदायों में ‘रोटी-बेटी का व्यवहार’ सामाजिक रिश्तों का महत्व...

शहीद अगनू बिंद जी स्वतंत्रता संग्राम के उन वीर सेनानियों में से थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया

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  स्वतंत्रता संग्राम में चंदौली के अगनू बिंद का योगदान:16 अगस्त 1942 को अंग्रेज दरोगा से भिड़े; चंदौली जिले के धानापुर क्षेत्र के किशनपुरा गांव के स्वतंत्रता सेनानी अगनू बिंद की कहानी स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 16 अगस्त 1942 को सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ अगनू बिंद धानापुर थाने पहुंचे। लोग उन्हें प्यार से दादा कहते थे। उन्होंने थाने पर तिरंगा फहराने की मांग की। तत्कालीन अंग्रेज दरोगा अनवारुल हक ने इस मांग को ठुकरा दिया। इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई। दरोगा ने गोलियां चलवा दीं। इस गोलीबारी में हीरा सिंह की मौके पर ही मौत हो गई। अगनू बिंद ने दरोगा पर लाठी से हमला किया, जिससे दरोगा की मौत हो गई। आज भी किशनपुरा गांव में अगनू बिंद के वंशज रहते हैं। उनके प्रपौत्र बेचू बिंद का कहना है कि उनका परिवार अभी भी सरकारी सुविधाओं से वंचित है। हर साल 16 अगस्त को किशनपुरा के ग्रामीण अगनू बिंद का शहादत दिवस मनाते हैं।

घारुक (Gharuk) – संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय

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  घारुक (Gharuk) – संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय घारुक जाति/उपजाति का उल्लेख पुराने जातीय व जनगणना संबंधी ग्रंथों में कहार (Kahar) समुदाय की एक उप-श्रेणी (sub-caste) के रूप में मिलता है। उपलब्ध स्रोतों के आधार पर मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: 1. जातीय स्थान घारुक, कहार जाति के अंतर्गत माने जाते हैं। कुछ ग्रंथों में कहार को महर (Mahra) या धीवर/मल्लाह जैसी जल-आधारित जातियों से संबंधित बताया गया है। 2. ऐतिहासिक दावे एक अंग्रेज़ी स्रोत में स्पष्ट उल्लेख है कि “The Gharuk sub-caste of the Kahars, however, claim descent from the Kauravas.” अर्थात घारुक उपजाति अपने को महाभारत काल के कौरवों का वंशज मानती है। यह भी कहा गया है कि वे कुरुक्षेत्र में स्नान नहीं करते, जो एक विशिष्ट पारंपरिक मान्यता मानी गई है। 3. धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताएँ कहार समुदाय के कुछ वर्गों में जल-देवता ख्वाजा खिज़्र (Khwaja Khizr) की पूजा का उल्लेख मिलता है। यमुना क्षेत्र में ख्वाजा से जुड़ी मान्यताओं के साथ-साथ हनुमान की आराधना का भी वर्णन मिलता है। ये परंपराएँ क्षेत्र और समय के अनुसार भिन...

Old Documents Kashyap ( Jhinwars , Mehra , Kahar )

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  A glossary of the tribes and castes of the Punjab and North-West frontier province by   Rose, H. A. (Horace Arthur), 1867-1933 ;  Ibbetson, Denzil, Sir, 1847-1908 ;  Maclagan, Edward Douglas, Sir, b. 1864

स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणो की आहुति देने वाले वीर अमर शहीद स्वर्गीय श्री बोबल सिंह धिंवर को शत-शत नमन🙏

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 स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणो की आहुति देने वाले वीर अमर शहीद स्वर्गीय श्री बोबल सिंह धिंवर को शत-शत नमन🙏 वर्तमान में स्वर्गीय श्री का परिवार नौकरी रोजगार में उन्नति पर है। विडंबना है हमारे समाज की कि हमारे समाज के कोई भी महापुरुष कवि लेखक स्वतंत्रता सेनानी को हमारा समाज याद ही नहीं करता और न हीं पता। अंग्रेजों की बर्बरता का गवाह है मेरठ के सरधना का भामोरी गांव, जब ब्रिटिश सिपाहियों ने बरसाईं थी गोलियां 18 अगस्त 1942 भामौरी गांव में मोटो की चौपाल पर गांधी आश्रम के कार्यकर्ता पंडित रामस्वरूप शर्मा ग्रामीणों को गांधी का संदेश दे रहे थे। ब्रिटिश सिपाहियों बरसाईं थी गोलियां। गोरों के जुल्म-ओ-सितम का गवाह है मेरठ के सरधना का भामोरी गांव। मिनी जलियांवाला गांव के नाम से मशहूर सरधना तहसील बेगम समरू साहब की रियासत का यह गांव जिला मुख्यालय से 38 किमी दूर है। उस काले दिन का नाम सुनकर यहां के ग्रामीणों का आज भी खून खौल जाता है। 18 अगस्त 1942 भामौरी गांव में मोटो की चौपाल पर गांधी आश्रम के कार्यकर्ता पंडित रामस्वरूप शर्मा ग्रामीणों को गांधी का संदेश दे रहे थे। सर्किल इंस्पेक्टर मो. याकूब...

कश्यप वंश – वो ऋषि, जिनसे सभ्यता की नींव रखी

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 कश्यप वंश – वो ऋषि, जिनसे सभ्यता की नींव पड़ी, महर्षि कश्यप के पुत्रों और वंशजों की ये गाथा सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि हमारी पहचान है।, जिनसे नागों का उद्धार हुआ, जिनसे भारत की सीमाएं म्यांमार तक फैलीं, जिनसे यज्ञ की परंपरा शुरू हुई, और जिनसे कश्मीर की धरती बसी — कश्यप वंश का हर नाम अपने आप में एक युग है। 1. #ऋषि_नील_कश्यप ये महर्षि कश्यप के पुत्र थे। “नील कश्यप” का उल्लेख गरुड़ पुराण और स्कन्द पुराण में मिलता है। कहा जाता है कि उन्होंने नाग जाति के उद्धार के लिए तप किया और “नील पर्वत” (आज का नीलगिरि क्षेत्र) पर तपस्या की थी। इन्हें नागों का रक्षक भी कहा गया है। 2. #ऋषि_ताम्र_कश्यप महर्षि कश्यप और अदिति के वंशजों में से एक। वायुपुराण में वर्णित है कि इनकी संतति “ताम्रनाग” कहलायी — जो आगे चलकर “ताम्रदेश” (आधुनिक बर्मा-म्यांमार) में बस गई। इनके कारण कश्यप कुल का प्रभाव भारत से बाहर भी फैला। 3. #ऋषि_अरिष्टनेमि_कश्यप यह नाम महाभारत (वनपर्व) में आता है। ये कश्यप वंशीय ऋषि थे जिन्होंने “यज्ञ की शुद्धि” के लिए एक विशेष अग्निकुण्ड की रचना की थी। बाद में इस पद्धति से यज्ञ करने वाले ब्राह्मण ...

मेहरा (कहार,झिवर,धीवर )समुदाय का इतिहास: 1891 की मारवाड़ जनगणना रिपोर्ट पर आधारित तथ्य

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 ✅ भारत के पश्चिमी क्षेत्र, विशेषकर राजस्थान के मारवाड़ में, कहार या मेहरा समुदाय एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह की भूमिका निभाता रहा है। इनके इतिहास, परंपरा और सामाजिक पहचान को लेकर कई स्थानीय मान्यताएँ लंबे समय से प्रचलित हैं। इन मान्यताओं का एक आधिकारिक स्रोत है—1891 की मारवाड़ जनगणना रिपोर्ट (Volume XII: The Castes of Marwar, Jodhpur – 1894)। इस रिपोर्ट में मेहरा/कहार समुदाय के बारे में दिए गए विवरण आज भी ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ⸻ ✅ मेहरा (कहार): राजपूतों के वंशज 1891 की जनगणना रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि: ✅ कहार, जिन्हें मेहरा भी कहा जाता है, राजपूतों के वंशज माने जाते हैं। रिपोर्ट विशेष रूप से लिखती है कि उनकी उत्पत्ति:  • चोबन (चौहान) राजपूत वंश से मानी जाती है। यह जानकारी स्थानीय परंपराओं, जनश्रुतियों और समुदाय की दीर्घकालीन मान्यताओं के आधार पर संकलित की गई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि मेहरा/कहार समुदाय का ऐतिहासिक संबंध राजपूती वंश और योद्धा परंपरा से गहराई से जुड़ा है। ⸻ ✅ कैम-खानी राजपूत भी करते थे विवाह-संबंध रिपोर्ट का एक...

Kahar (Mehara ) - Rajasthani Ki Jatiya by Bajrang lal lohiya

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कश्यप राजपूत क्षत्रिय

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 1 Book name - कश्यप राजपूत क्षत्रिय -  आज के दौर में जिस प्रकार झींवर, धींवर आदि समुदाय संगठित करने का प्रयत्न जारी है इसी प्रकार पहले भी महापुरुषों द्वारा कश्यप नाम से इन्हें संगठित करने का प्रयत्न किया प्रतीत होता है। इस विषय में कहते हैं कि किसी समय महाऋषि कण्व मिश्र देश गये थे जहां बहुत से प्राचीन क्षत्री, वैश्य क्रिया विहीन हुए शूद्रों से भी निम्न मलेच्छ आदि हुए बैठे थे। वहां उन्होंने भारतीय प्राचीन धर्म एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया जिसके फलस्वरूप उनके साथ दस सहंस्त्र शिष्य भारतीय शिक्षा प्राप्त करने भारत आये थे और वह धींवर, झींवर आदि भारतीय जातियों में मिलके कश्यप वंशी काश्यपूत कहलाये थे। जिसका कुछ वृतान्त भविष्य पुराण (भाग एक) में मिलता है, इस विषय का किसी महानुभाव द्वारा भेजा गया श्लोक : कश्यप, कण्व विप्र ऋषि मिश्र देश: गतो पुरा। कथं कुरुवन्तु कारुका झीवर बाढ़ी तक्षक। ।। दशः सहतन्त्र एवं दितया च भारतीय भाषा शिक्षायेन। धींवरे मेल दित्या च तस्मात् कश्यप स्मृत्यन्।। 2 Book name - भविष्य पुराण - सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिस्स्रदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छो...

माहरः- यह कहार जाति का नवां भेद है

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 ९-माहरः- यह कहार जाति का नवां भेद है 'महाउर' नाम के एक क्षत्रिय राजा हुए हैं जिनका वंश महावर कहाते कहाते माहर व महरा कहाने लगा यह नाम राजपूताना में भी प्रचलित है। इनकी संख्या भारत के एक यू० पी० में १२१०८७ है। महरा का दूसरा नाम देश भेद के कारण "मेरा" भी है यह कहारों की एक जाति है। एक समय बादशाह शाहबुद्दीन- गौरी का पेट कुजा तो सहज में आराम न हुआ उस समय बहुत से क्षत्रिय जो शाहबुद्दीन की कैद में थे उनमें एक बुद्धिमान क्षत्रिय वैद्यक जानने वाला था उसने बतलाया कि "बादशाह साहय को विजोरा खिलाओ" तदनुसार विजोरा से बादशाह को आराम मालूम हुआ तव बादशाह सलामत ने प्रसन्न होकर उस दक्षत्रिय को बुलाकर कहा 'तुम क्या चाहते हो ?' वह बोला हुजूर मेरी जाति के मनुष्य कैद में से छोड़ दिये जायें यह बाद- शाह ने लोकार किया और हुकुम दिया कि "जिस २ को यह अपना बतलाये वे सब छोड़ दिये जाय तब उसने जेलखाने में आकर जिनको कहा कि यह मेरा, यह मेरा वे वे सब छोड़दिये गये तबसे मेरे व महरे कहाये। इनकी सन्तति बढ़ने के कारण ये लोग देश देशान्तर में फैलगये और महरा व मेरा की एक आति अलग बनगई पश...

म्हारा छोरा 🥇मेडल जिता वो बी ✈️ विदेश में तै

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🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇 विश्व निशानेबाजी चैंपियनशिप #10मीटर #एयरपिस्टल  #शूटिंग में बागपत जिले #गोपालपुरखड़ाना के लाल श्रवण कश्यप के द्वारा #काहिरा #मिस्र (#egypt) में अपने देश का परचम लहराते हुए गोल्ड मेडल प्राप्त कर अपने देश, समाज, और परिवार का नाम रोशन करने पर आज भाई के सम्मान में सम्मान समारोह आयोजित किया गया कश्यप समाज गोपालपुर खड़ाना और सभी आयोजक बंधुओं के सहयोग में भाई Madan Mehra के विशेष सहयोग से कार्यक्रम आयोजित किया गया श्री Suresh Kumar Kashyap जी पूर्व सदस्य विधान परिषद कार्यक्रम ने अतिथि के तौर पर भाई श्रवण कश्यप को सम्मानित किया तथा समारोह को संबोधित किया जिस प्रकार आज भाई श्रवण कश्यप ने कठिन परिस्थितियों में अपने संघर्षों के दम पर आज यह मुकाम हासिल किया है यह काबिले तारीफ है बच्चे अगर ठान ले तो क्या नहीं हो सकता है  दृढ़ इच्छाशक्ति से की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती  आज श्रवण कश्यप है कल आप या समाज का कोई भी अन्य बच्चा इस मुकाम पर हो सकता है  मेरी ओर से भाई श्रवण कश्यप को बहुत बहुत बधाई ओर शुभकामनाएं साथ ही  में आगामी भविष्य में ईश्वर से आपक...

वीरांगना झलकारी बाई

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  वीरांगना झलकारी बाई: - झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को झांसी के पास भोजला गांव में एक कोली (कश्यप) परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही साहसी थीं, और उनके पिता ने उन्हें घुड़सवारी और हथियारों का प्रशिक्षण दिया। वह झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की दुर्गा दल नामक महिला सेना की सेनापति बनीं और 1857 के विद्रोह में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सबसे बड़ी वीरता रानी लक्ष्मीबाई का वेश धारण करके युद्ध करना था, जिससे रानी को किले से सुरक्षित बाहर निकलने का मौका मिला।  जीवन परिचय जन्म: 22 नवंबर 1830 को भोजला, झांसी में। परिवार: पिता सदोवर सिंह और माता जमुना देवी। वह एक गरीब कोली (कश्यप) परिवार से थीं। प्रारंभिक जीवन: छोटी उम्र में ही मां का निधन हो गया और पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला। उन्होंने घुड़सवारी, हथियार चलाना और कुश्ती जैसे कौशल सीखे। साहसिक कार्य: बचपन में ही उन्होंने अकेले बाघ से लड़ने और डाकुओं को भगाने जैसे कई साहसिक काम किए। विवाह: उनके साहस से प्रभावित होकर उनकी शादी झाँसी की सेना के एक सैनिक पूरन कोली से कर दी गई। झाँसी की सेना में: वह झाँसी की सेना की दुर्गा...

ॐ, सूर्य और कोविदार वृक्ष।

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 ॐ, सूर्य और कोविदार वृक्ष। कोविदार वृक्ष मंदार और पारिजात वृक्षों का संकर है, जिसे ऋषि कश्यप द्वारा बनाया गया माना जाता है। यह प्राचीन काल में पौधों के संकरण (हाइब्रिडाइजेशन) के ज्ञान का प्रमाण भी माना जाता है। सूर्य का प्रतीक भगवान राम के सूर्यवंश का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ॐ शाश्वत और पवित्र आध्यात्मिक ध्वनि का प्रतीक है। #kashyap #kashyapsmaj #jaishreeram

अमर शहीद बाबा मोती राम मेहरा जी का वार्षिक शहीदी दिवस

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 🙏 जय महर्षि कश्यप जी की 🙏 🙏 जय अमर शहीद बाबा मोती राम मेहरा जी की 🙏 कश्यप समाज के लिए गर्व का विषय है कि अमर शहीद बाबा मोती राम मेहरा जी का वार्षिक शहीदी दिवस इस वर्ष दिनांक 25, 26 और 27 दिसंबर 2025 को फतेहगढ़ साहिब (पंजाब) में भव्य रूप से आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन हमारे इतिहास, त्याग और बलिदान की अमर गाथा को पुनः जीवंत करेगा — जहाँ समाज, संस्कृति और समर्पण का संगम देखने को मिलेगा। इसी क्रम में, राष्ट्रीय आयुर्वेदिक महोत्सव का आयोजन 12, 13 और 14 दिसंबर 2025 को इंद्रधनुष ऑडिटोरियम, पंचकूला (हरियाणा) में किया जाएगा। यह महोत्सव भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली — आयुर्वेद को समर्पित है, जो स्वस्थ जीवन और प्राकृतिक चिकित्सा की दिशा में समाज को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। 🌿 दोनों कार्यक्रमों के संदर्भ में, श्री अनूप भारद्वाज कश्यप, राष्ट्रीय अध्यक्ष – आल इंडिया कश्यप राजपूत पंजाबी वेलफेयर सोसाइटी एवं प्रदेश अध्यक्ष – आयुर्वेदिक ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन हरियाणा (ADMAH), अपने प्रतिनिधिमंडल सहित माननीय मुख्यमंत्री हरियाणा श्री नायब सिंह सैनी जी के निवास स्थान पर पहुँचे। उन्होंने...