आदिवासी : गिरिजन से भारतीय संस्कृति तक
काफी समय पहले आदिवासियों को लेकर विवाद हुआ कि इन्हें किस नाम से पुकारा जाए – आदिवासी, वनवासी, गिरिजन, भूमिजन, अरण्यवासी या आदिम जाति। इस पर अलग-अलग मत थे। राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इन्हें गिरिजन कहने की सलाह दी। उनका विचार था कि हरिजन और गिरिजन मिलकर ही भारत का बहुजन (बहुसंख्यक समाज) बनते हैं। संविधान में हालांकि इनके लिए आदिम जाति शब्द का प्रयोग किया गया और वही मान्य हो गया।
आदिवासियों की उत्पत्ति के बारे में पुराणों और संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। भागवत के अनुसार, ध्रुव की सातवीं पीढ़ी में राजा निषाद हुए, जिनकी संतानें जंगलों में बस गईं और उन्हें आदिवासी कहा गया। इससे पता चलता है कि वे भारत के मूल निवासी और आदिम पुरुष की संतान हैं।
एक और कथा कहती है कि हमारे आदि जनक महर्षि कश्यप थे। कश्यप पर्वत ही उनका स्थान था। उनकी पत्नियों से विभिन्न जातियाँ उत्पन्न हुईं –
• दिति से दैत्य (राक्षस),
• अदिति से देवता,
• कद्रू से नाग,
• विनता से गरुड़ और गारुड़ जाति।
इससे यह प्रमाणित होता है कि सब एक ही पिता की संतान माने जाते थे और भारतभूमि को ही अपना घर समझते थे। संस्कृत साहित्य और पुराणों में भी यह वर्णन है कि आर्य और वनवासी बाहर से नहीं आए, बल्कि यहीं के थे। वे आपस में रहते थे और कभी बाहरी जातियों से युद्ध नहीं किया।
वैदिक काल से ही भारतीय और वनवासी एक साथ रहते आए हैं। वे आपस में विवाह करते थे और एक-दूसरे की संस्कृति को अपनाते थे। हिंदुओं की कई परंपराएँ, जैसे सिंदूर प्रथा और मूर्तिपूजा, आदिवासियों से आईं। वहीं आदिवासियों ने भी हिंदुओं से अनेक संस्कार अपनाए।
निष्कर्ष
आदिवासी हमसे अलग नहीं हैं। उनकी और हमारी संस्कृतियाँ मिलकर ही भारतीय संस्कृति बनी है। इसलिए उन्हें किसी अजनबी या अलग जीवन मानना गलत है। वे हमारे राष्ट्र के अभिन्न अंग हैं।



