मेहरा (कहार,झिवर,धीवर )समुदाय का इतिहास: 1891 की मारवाड़ जनगणना रिपोर्ट पर आधारित तथ्य

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भारत के पश्चिमी क्षेत्र, विशेषकर राजस्थान के मारवाड़ में, कहार या मेहरा समुदाय एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह की भूमिका निभाता रहा है। इनके इतिहास, परंपरा और सामाजिक पहचान को लेकर कई स्थानीय मान्यताएँ लंबे समय से प्रचलित हैं।

इन मान्यताओं का एक आधिकारिक स्रोत है—1891 की मारवाड़ जनगणना रिपोर्ट (Volume XII: The Castes of Marwar, Jodhpur – 1894)।

इस रिपोर्ट में मेहरा/कहार समुदाय के बारे में दिए गए विवरण आज भी ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।



✅ मेहरा (कहार): राजपूतों के वंशज


1891 की जनगणना रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि:


✅ कहार, जिन्हें मेहरा भी कहा जाता है, राजपूतों के वंशज माने जाते हैं।


रिपोर्ट विशेष रूप से लिखती है कि उनकी उत्पत्ति:

 • चोबन (चौहान) राजपूत वंश

से मानी जाती है।


यह जानकारी स्थानीय परंपराओं, जनश्रुतियों और समुदाय की दीर्घकालीन मान्यताओं के आधार पर संकलित की गई थी।

इससे यह स्पष्ट होता है कि मेहरा/कहार समुदाय का ऐतिहासिक संबंध राजपूती वंश और योद्धा परंपरा से गहराई से जुड़ा है।



✅ कैम-खानी राजपूत भी करते थे विवाह-संबंध


रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि:

 • कैम-खानी मुसलमान, जो स्वयं को राजपूत मूल का मानते हैं,

 • वे भी मेहरा समुदाय के साथ विवाह संबंध रखते थे।


यह तथ्य दर्शाता है कि मेहरा समुदाय उस समय की सामाजिक संरचना में सम्मानित और प्रभावशाली वर्ग माना जाता था, और अन्य राजपूत वंशों द्वारा सामाजिक रूप से स्वीकार किया गया था।



✅ “मेहरा / मेरा” नाम की ऐतिहासिक लोक-कथा


जनगणना रिपोर्ट में एक अत्यंत रोचक और लोकप्रिय लोक-कथा शामिल है।

उसके अनुसार:


✅ मेहरा नाम का संबंध पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन गौरी के युद्ध से जोड़ा जाता है।


कथा यह कहती है कि:

 • गौरी ने युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद कई राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया।

 • विजय के तुरंत बाद वह बीमार पड़ गया।

 • एक बंदी राजपूत ने उसकी सेवा की और उसकी पीड़ा दूर की।

 • राहत मिलने पर गौरी ने उससे वर माँगने को कहा।

 • राजपूत ने बदले में अपने साथियों की रिहाई माँगी।

 • गौरी ने जिन योद्धाओं को “मेरा” या “मेहरा” कहकर संबोधित किया,

उन्हें मुक्त कर दिया गया।


ये मुक्त किए गए राजपूत आगे चलकर:

 • एक स्वतंत्र समुदाय बने,

 • और समय के साथ पालकी ढोने का पेशा अपनाया।

इसी कारण उन्हें मेहरा (कहार) कहा जाने लगा।


यह कथा आज भी राजस्थान के कई हिस्सों में गहरे सम्मान के साथ सुनाई जाती है।



✅ कहार/मेहरा: सेवक नहीं, निष्ठावान योद्धाओं की वंश परंपरा


अक्सर लोग कहार समुदाय को केवल “पालकी ढोने वाला वर्ग” मानते हैं,

लेकिन 1891 की रिपोर्ट बताती है कि:


✅ उनकी पहचान सिर्फ सेवा से नहीं, बल्कि राजपूती वंश और गौरवशाली परंपराओं से भी जुड़ी हुई है।


कई सामाजिक और ऐतिहासिक संकेत इस बात की पुष्टि करते हैं कि:

 • मेहरा समुदाय का मूल योद्धा वर्ग था,

 • परिस्थितियों के अनुसार उन्होंने सेवाधर्मी कार्य अपनाए,

 • लेकिन उनका सामाजिक सम्मान उच्च बना रहा।


यही कारण है कि उनके साथ कई राजपूत और कैम-खानी परिवारों ने वैवाहिक संबंध तक बनाए।



✅ कहार समुदाय की विशिष्ट सामाजिक भूमिका


1891 की रिपोर्ट में मेहरा/कहार समुदाय के मुख्य कार्य ये बताए गए हैं:

 • शाही और प्रमुख व्यक्तियों को पालकी द्वारा यात्रा कराना

 • पानी पिलाने और घरेलू सेवा के महत्वपूर्ण कार्य

 • आयोजन, समारोह और राज दरबार में विशेष सेवाएँ


लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि:


✅ उनका कार्य सेवा होते हुए भी, उनकी सामाजिक स्थिति निम्न नहीं मानी जाती थी।


क्योंकि सभी जातियों द्वारा उनके हाथ के पानी और भोजन को स्वीकार किया जाता था।



✅ निष्कर्ष: एक गौरवशाली परंपरा का प्रमाणित इतिहास


“Census of Marwar – 1891” जैसी आधिकारिक रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि:

 • मेहरा (कहार) केवल सेवक या श्रमिक वर्ग नहीं थे,

 • बल्कि वे राजपूत वंशज, विशेषतः चौहान/चोबन वंश से उत्पन्न एक सम्मानित समुदाय हैं।

 • उनकी पहचान में शौर्य, निष्ठा और सेवा—दोनों तत्व शामिल हैं।

 • “मेहरा” नाम भी एक महान ऐतिहासिक प्रसंग से जुड़ा हुआ है।


इस प्रकार मेहरा/कहार समुदाय का इतिहास समृद्ध, गहरा और गौरवपूर्ण है।


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