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फलवा कहार के बारे में 👏 / कश्यप समुदाय इतिहास

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  आज का मेरा ये लेख फलवा कहार के बलिदान को समर्पित हे आज उनकी आत्मा भी रोती होगी के जिस युद्ध में उन्होंने सब कुछ न्योछावर कर दिया लेकिन उनका समाज उन्हें याद भी नहीं कर सका। तैमूर लांग युद्ध,,,, तैमूर लांग का उत्तर भारत पर आक्रमण तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई० में भारत पर अपने लगभग 92000 घुड़सवारों की सेना से भयानक आक्रमण कर दिया। तैमूर के हिन्दू कत्लेआम, लूट खसोट और अत्याचारों के बढ़ने पर संवत् 1455 (सन् 1398 ई०) में सर्वखाप पंचायत का एक बड़ा अधिवेशन मेरठ जिले के मध्य जंगलों में हुआ। एक आह्वाहन पर पंचायती सेना में 80,000 मल्ल योद्धा सैनिक और 40,000 युवा महिलायें शस्त्र लेकर एकत्र हो गये।  जिनमे से एक थे फलवा कहार,,, फलवा कहार के बारे में ऐसा कहा जाता हे की मुज़फ्फरनगर सहारनपुरऔर हरिद्वार के बीच में महाबली फलवा कहार की सेना थी जिसने यहाँ तिमूर की सेना में भयंकर मार काट मचाई थी और उसे भागने पर विवश कर दिया था , पंचायती सेनाओं के योद्धा दिल्ली से मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर तथा हरद्वार तक फैल-फैल कर यथास्थान पहुंचकर इस सारे क्षेत्र में तैमूर की सेनाओं से भिड़ गये थे तथा उनसे छापामार...

Introduction to Maharishi Kashyap / महर्षि कश्यप जी

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  Maharishi Kashyap is a highly important and respected sage in Hindu mythology, Vedic traditions, and ancient Indian literature. He is known as the creator of the universe, one of the Prajapatis, and the father of all living beings. His role, lineage, and contributions are described in detail in various texts such as the Vedas, Puranas, Ramayana, Mahabharata, and Upanishads. Let us understand about him in detail: 1. Introduction to Maharishi Kashyap • Name and Meaning: The word "Kashyapa" means "tortoise" or "tortoise" in Sanskrit. The name reflects his symbolic significance, as the tortoise is considered a symbol of stability, longevity, and balance. Some scholars believe that the name also reflects his patience and depth of knowledge. • Place in Saptarishi: Maharishi Kashyap is one of the seven ancient sages (Saptarishi) mentioned in the Rig Veda and other Vedic texts. The other Saptarishis include Atri, Vasishtha, Viswamitra, Jamadagni, Bharadwaja, an...

गौ रक्षा के लिए कश्यप समाज आगे आए / Kashyap community came forward to protect cows

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  गौ रक्षा के लिए कश्यप समाज आगे आए गौ माता का महत्व गौ माता हिंदू धर्म में पूजनीय मानी जाती हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति में मातृ स्वरूप में देखा जाता है। वे केवल एक पशु नहीं, बल्कि आर्थिक, धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। भारतीय समाज में गाय का पालन-पोषण कृषि, चिकित्सा और धार्मिक कार्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है। कश्यप समाज की भूमिका कश्यप समाज, जो महर्षि कश्यप के वंशज माने जाते हैं, ने ऐतिहासिक रूप से कृषि, पशुपालन और सामाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब समय आ गया है कि यह समाज गौ रक्षा के लिए संगठित होकर कार्य करे और समाज में जागरूकता फैलाए। गौ रक्षा में कश्यप समाज की पहल 1. गौशालाओं की स्थापना कश्यप समाज के लोगों को अपने क्षेत्र में गौशालाएँ स्थापित करनी चाहिए, जहाँ बीमार, लावारिस और बेसहारा गायों को सुरक्षित रखा जा सके। गौशालाओं को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर, गौमूत्र और गोबर से जैविक उत्पाद तैयार करने की योजना बनाई जा सकती है। 2. गौ तस्करी और हत्या रोकने में सहयोग कश्यप समाज को गौ तस्करी और अवैध कत्लखानों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। स्थानीय प्रशासन...

धीमर/कश्यप/निषाद/तुरहास/कहार जातियों की उत्पत्ति का दावा

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  धीमर जाति के एक विद्वान के अनुसार, इन जातियों की उत्पत्ति कालू बाबा के वंशजों से मानी जाती है। कालू बाबा की कथा धीमरों की मान्यता के अनुसार, एक कालू बाबा नामक महापुरुष हुए, जो अपने गहरे रंग के कारण प्रसिद्ध थे। वे एक विचलित प्रवृत्ति (संन्यासी स्वभाव) के व्यक्ति थे और ब्राह्मणों के मध्य होने वाली बहसों को ध्यानपूर्वक सुनते थे। एक दिन, एक बहस में यह प्रश्न उठा कि "दुनिया का सबसे कठिन कार्य कौन सा है?" ऋषि मुनि ने कालू बाबा से इस पर उनकी राय पूछी, क्योंकि वे नित्य इन चर्चाओं को सुनते रहते थे लेकिन कभी बोलते नहीं थे। कालू बाबा ने उत्तर दिया कि "सेवा कार्य (Seva Karya) ही सबसे कठिन कार्य है।" इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि वे सेवा कार्य करने के लिए अवतार लेंगे। इस विचार-विमर्श के उपरांत ऋषि मुनि ने कालू बाबा को "धीमर" की उपाधि दी। इस शब्द की उत्पत्ति 'धिन' (बुद्धि) + 'वर' (श्रेष्ठ) से हुई, जिसका अर्थ है "श्रेष्ठ बुद्धि वाला"। कालू बाबा की पूजा और मंदिर धीमर/कश्यप जाति के लोगों ने कालू बाबा के सम्मान में विभिन्न स्थानों पर उनके मंदिरों...

नाथ संप्रदाय और मच्छन्द्रनाथ (धीवर) का योगदान

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  शैव धर्म पूर्व मध्यकाल के दौरान भारत में एक नए रूप और नए आयाम में विकसित हो रहा था, जिसे कालांतर में नाथ संप्रदाय अथवा हठयोग और सहजयान सिद्धि कहा गया। इस संप्रदाय में नौ नाथों को दिव्य पुरुष के रूप में माना गया, जिनमें प्रथम नाथ स्वयं भगवान शिव थे। इस संप्रदाय का प्रचार 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मत्स्येन्द्रनाथ अथवा मच्छन्द्रनाथ के द्वारा किया गया। उनका जन्म बंगाल के एक धीबर परिवार में हुआ था। उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों की यात्राएँ कीं और ‘योगिनी कौल’ नामक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसका विस्तृत वर्णन उनके ग्रंथों ‘कौल’, ‘ज्ञाननिर्णय’ और ‘अकुलवीर तंत्र’ में मिलता है। अकुल-कुल सिद्धांत और तांत्रिक परंपरा इस सिद्धांत के अनुसार: शिव को ‘अकुल’ और शक्ति को ‘कुल’ कहा गया। दोनों का अन्योन्याश्रित संबंध है, अर्थात् एक-दूसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं। इनके संयोग से ही सृष्टि की रचना होती है, और इस संयोग प्रक्रिया को मानव जीवन में उतारना ही इसका धार्मिक क्रियान्वयन है। इस संयोग का प्रतीक स्त्री-पुरुष संबंध है, जो बौद्धों की वज्रयान शाखा से साम्यता रखता है। इसी कारण मत्स्येन्...

भूर्षुत राज्य और धीवर ( कश्यप )वंश: एक भूली-बिसरी विरासत

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  भूर्षुत राज्य और धीबर वंश: एक भूली-बिसरी विरासत इतिहास के पन्नों में कई ऐसे साम्राज्य और शासक गुम हो गए जिनकी वीरता और शासन कला अपने समय में अद्वितीय थी। भूर्षुत राज्य (Bhurishrestha Kingdom) भी उन्हीं में से एक है, जिसका शासन दक्षिणी राढ़ क्षेत्र में फैला हुआ था। यह राज्य न केवल व्यापार और समृद्धि का केंद्र था, बल्कि योद्धाओं और राजाओं की भूमि भी था। भूर्षुत राज्य का उत्थान पीयूष शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक "Brahman Itihasa: Forgotten History of Bharatvarsha" (2021) के अनुसार, भूर्षुत राज्य दक्षिणी राढ़ क्षेत्र में स्थित था, जहाँ मुख्य रूप से भूरिश्रेष्ठी समुदाय का वर्चस्व था। यह समुदाय व्यापारी वर्ग से संबंधित था, लेकिन इसे राढ़ी ब्राह्मणों का प्रमुख केंद्र भी माना जाता था। धीबर वंश का शासन (14वीं-15वीं शताब्दी) लोककथाओं और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, 14वीं-15वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर धीबर वंश का शासन था। यह वंश अपनी क्षत्रिय योद्धा परंपराओं और युद्ध-कौशल के लिए प्रसिद्ध था। धीबर शासकों ने इस क्षेत्र में दीर्घकाल तक राज किया और अपनी सत्ता को सुदृढ़ बनाए रखा। अंतिम ध...

कश्यप समाज में होली का महत्व और परंपराएँ

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  होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत, आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। कश्यप समाज में होली का विशेष महत्व है, जहां यह न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पारंपरिक और सांस्कृतिक रूप से भी गहरी जड़ें रखता है। इस ब्लॉग में हम कश्यप समाज में होली की परंपराओं, रीति-रिवाजों और इस त्योहार के महत्व को विस्तार से जानेंगे। --- होली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व कश्यप समाज की उत्पत्ति महर्षि कश्यप से मानी जाती है, जो भारतीय संस्कृति में एक महान ऋषि और वैदिक परंपराओं के संरक्षक थे। इस समाज में होली का पर्व केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पारिवारिक और आध्यात्मिक शुद्धि का समय भी माना जाता है। होली की होलिका दहन से जुड़ी कथा कश्यप समाज में विशेष रूप से पूजी जाती है। भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और होलिका के अहंकार के नाश की यह कहानी अच्छाई की बुराई पर विजय का संदेश देती है। इसी कारण होलिका दहन को असत्य, अहंकार और नकारात्मकता को ...