हिंगलाज माता की स्थापना कहार ढीमर (महतों) परिवार ने किया

 



हिंगलाज माता

हथकुरी-पवई, जिला पन्ना

इनका नामहिंगलाज माता है और इन्हें हथकुरी की हिंगलाज माता के नाम से ही जाना जाता है ये पवई जनपद मुख्यालय से लगभग 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं। इनका कोई उपनाम तो ज्ञात नहीं होता किन्तु इनकी मान्यता बहुत अधिक है।


इनकी स्थापना का ज्ञान यहाँ के भक्तों को तो नहीं है ना ही इनकी स्थापना की परिस्थितियों का ही भान है किन्तु यहाँ पर माता के कारनामों एवं उनके भक्तों की रक्षा के एवं विभिन्न रहस्यों के चर्चे विभिन्न भक्तों के जुबान पर आते रहते हैं।


इन माता को यहाँ कौन लाया इसकी जानकारी तो यहाँ के भक्तों को नहीं है किन्तु पुराने बुजुर्गों द्वारा बताया जाता है कि इन्हें एक कहार ढीमर (महतों) परिवार ने यहाँ पर बसाया था और उनके परिवार के लोग ही मुख्यरूप से हिंगलाज माता की पूजा-अर्चना करते रहे हैं।.....


बताया जाता है कि जब माता यहाँ के जंगलों में निवास करती थीं और कहार ढीमर परिवार की छठवीं पीढ़ी के परदादा इनकी पूजा जंगल में किया करते थे तभी माता ने स्वप्न दिया कि उन्हें बस्ती में ले जाया जाए ताकि लोगों में आस्था के बीज अंकुरित हो सकें और अमन चैन स्थापित हो सके; तभी से उन्हें यहाँ लाया गया था।

यहाँ के लोगों ने बताया कि यह क्षेत्र आज भी काफी अपराधी एवं बिगड़ा है तथा ठाकुर एवं ब्राम्हण परिवार रहते हैं जिनकी दुष्प्रवृत्तियाँ हैं जिसको ढीक करने के लिए कहार ढीमर (महतों) से माता ने आस्था के अंकुर डालने के उद्देश्य से स्थापना के लिए आज से छठवीं पीढ़ी में कहा रहा होगा।


वैसे तो ये खुले में स्थापित रहीं हैं किन्तु कालान्तर में जीर्णशीर्ण एक छोटे सी मन्दिरिया के रूप में इनपर स्थानीय भक्तों के द्वारा छाया की गई है। मन्दिर के अन्दर एक पीतल की छोटी सी मूर्ति सिंहासन स्थित है जिनकी पूजा महतों के परिवार के द्वारा की जाती है जो केवल मात्र नवदुर्गा के समय पर ही मॉजी और साफ की जाती है।


यहाँ के स्थानीय श्रृद्धालु बताते हैं कि जंगल से एक बच्चे की तरह ढीमर परिवार के लोग माता को लाए और अनवरत पूजा-पाठ अपने छोटे-छोटे संसाधनों से करते रहे हैं तभी से लोगों में उनके प्रति भरोसा है।


माता पर स्थानीय भक्तों को भरोसा है कि महतों परिवार के लोगों के अलावा कोई भी उनके पास जाकर पूजा अर्चना नहीं कर सकता यदि करता भी है तो उसे कोई ना कोई नुकसान होता है ऐसी मान्यता है। बगैर माता के इशारे या संदेश या निर्मित परिस्थिति के अनुसार ही कोई व्यक्ति माता को छू सकता है अन्यथा छू भी नहीं सकता। श्री हरिशंकर रावत द्वारा (हथकुरी में सन् 1962 में शिक्षक पद पर पदस्थ रहे हैं) बताया जाता है कि मंदिर के पास से रात्रि 11 बजे के बाद से बृम्ह मुहूर्त तक ना तो कोई मन्दिर जा सकता था और ना ही मन्दिर के सामने से गुजर सकता था।



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