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आदिवासी : गिरिजन से भारतीय संस्कृति तक

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 आदिवासी : गिरिजन से भारतीय संस्कृति तक काफी समय पहले आदिवासियों को लेकर विवाद हुआ कि इन्हें किस नाम से पुकारा जाए – आदिवासी, वनवासी, गिरिजन, भूमिजन, अरण्यवासी या आदिम जाति। इस पर अलग-अलग मत थे। राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इन्हें गिरिजन कहने की सलाह दी। उनका विचार था कि हरिजन और गिरिजन मिलकर ही भारत का बहुजन (बहुसंख्यक समाज) बनते हैं। संविधान में हालांकि इनके लिए आदिम जाति शब्द का प्रयोग किया गया और वही मान्य हो गया। आदिवासियों की उत्पत्ति के बारे में पुराणों और संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। भागवत के अनुसार, ध्रुव की सातवीं पीढ़ी में राजा निषाद हुए, जिनकी संतानें जंगलों में बस गईं और उन्हें आदिवासी कहा गया। इससे पता चलता है कि वे भारत के मूल निवासी और आदिम पुरुष की संतान हैं। एक और कथा कहती है कि हमारे आदि जनक महर्षि कश्यप थे। कश्यप पर्वत ही उनका स्थान था। उनकी पत्नियों से विभिन्न जातियाँ उत्पन्न हुईं –  • दिति से दैत्य (राक्षस),  • अदिति से देवता,  • कद्रू से नाग,  • विनता से गरुड़ और गारुड़ जाति। इससे यह प्रमाणित होता है कि सब एक ही पिता की संतान...

रामजी गोंड : आदिलाबाद का वीर, 1857 के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम का सेनानी

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  रामजी गोंड : आदिलाबाद का वीर, 1857 के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम का सेनानी नाम: रामजी गोंड जन्म: वर्तमान आसिफाबाद जिला, तेलंगाना (पूर्व में हैदराबाद रियासत) शहीद: 9 अप्रैल 1860 रामजी गोंड तेलंगाना के निरमल, आदिलाबाद और आसिफाबाद क्षेत्रों के महान आदिवासी नायक थे। वे उन प्रमुख योद्धाओं में शामिल थे जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हैदराबाद रियासत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा। उनके शासन क्षेत्र में निरमल, उटनूर, चेनूर और आसिफाबाद शामिल थे — जहाँ वे गोंड समुदाय के प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में जाने जाते थे। 1857 का विद्रोह और रामजी गोंड की भूमिका 1857 में जब पूरे देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह की लहर उठी, तब नizam के राज्यों में भी जनता में असंतोष बढ़ रहा था। आदिलाबाद के गोंड आदिवासी किसान अत्याचारों, शोषण और ब्रिटिशों के प्रति रियासत की नीतियों से नाराज़ थे। इसी समय रामजी गोंड ने गोंडों को संगठित किया और उनके साथ रोहिल्ला नेता मियाँ साहेब खुर्द भी विद्रोह में शामिल हुए। दोनों ने मिलकर लगभग दो वर्षों तक दुश्मन के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध जारी र...

बाबा मोती मेहरा( कश्यप) जी

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  बाबा मोती मेहरा( कश्यप) जी  3 जनवरी 1705 शहीद बाबा मोतीराम मेहरा को औरंगजेब के किलेदार वजीर खान ने परिवार सहित कोल्हू में पीसा था बाबा मोतीराम मेहरा । जिनका वर्णन हर सिक्ख ग्रंथ में है । इन्हे सरहिन्द के किलेदार वजीर खान ने परिवार सहित जिन्दा कोल्हू में पीसा था ।   इनकी वीरता और बलिदान का उल्लेख बंदा बैरागी ने किया था । और इनकी स्मृति में एक गुरुद्वारा फतेहगढ़ में बना है । बाबा मोतीराम मेहरा के चाचा हिम्मत राय गुरु गोविन्द सिंह जी के पंच प्यारों में से एक थे सिक्ख बनकर उनका नाम हिम्मत सिंह हुआ ।  इनके पूर्वज जगन्नाथ पुरी उड़ीसा के रहने वाले थे । समय के साथ पंजाब आये और सरहिन्द में नौकरी कर ली । बाबा मोतीराम जी के पिता हरिराम कैदखाने की रसोई घर के इंचार्ज थे । दिसम्बर 1704 के अंतिम सप्ताह गुरु गोविन्द सिंह के चारों साहबजादे शहीद हुये थे । वह 27 दिसंबर 1704 की तिथि थी जब दो दिन की यातनाएं देकर गुरुजी को दो छोटे साहबजादों को जिन्दा दीवार में चुनवाया गया था । और गुरुजी माता गूजरी को अमानवीय यातनायें दी गयीं । वे भी शहीद हुईं । बाबा मोतीराम का अपराध यह था कि दिसम्ब...

कहार–धीवर–घारुक समुदाय: इतिहास, परंपरा और उपभेदों का प्राचीन दस्तावेज़ी स्वरूप

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  कहार–धीवर–घारुक समुदाय: इतिहास, परंपरा और उपभेदों का प्राचीन दस्तावेज़ी स्वरूप भारतीय समाज में जल-सम्बंधित कार्यों, नदी-घाटों और ऐतिहासिक पूजा-परंपराओं से जुड़े कई समुदाय हैं। इनमें कहार, धीवर, और उनकी उपजातियाँ—जैसे घारुक—विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पुराने अंग्रेज़ी राजकाल के दस्तावेज़ों से लेकर हिंदी जाति-ग्रंथों तक, इन समुदायों का विवरण कई स्थानों पर मिलता है। इन स्रोतों को पढ़ने पर एक समृद्ध, प्राचीन और अत्यंत रोचक इतिहास सामने आता है। ⸻ 1. अंग्रेज़ी स्रोत: “Kahár = Dhiwar” और जल-देवता की मान्यता पहली ऐतिहासिक पुस्तक (ब्रिटिश काल का जाति-विवरण) स्पष्ट रूप से कहती है कि:  • कहार (Kahár) का समानार्थक शब्द धीवर (Dhiwar) है।  • फरीदकोट, महरा आदि क्षेत्रों में कहार-समुदाय के लोग सभी सामाजिक निर्णय अपनी जाति पंचायत (rancháyat) में करते थे।  • मुस्लिम कहारों में भी पानी के देवता “ख्वाजा ख़िज़्र” की पूजा की परंपरा बची हुई थी।  • दिलचस्प बात यह है कि धीवरों में भी वही परंपरा मिलती है, यानी कहार और धीवर दोनों में जल-देवता का सांस्कृतिक प्रभाव समान रूप से था। ख्वाजा ...

गुजराती भोई समुदाय : इतिहास, पहचाना और परंपरा का अनोखा संगम

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  गुजराती भोई समुदाय : इतिहास, पहचाना और परंपरा का अनोखा संगम भारत की विविध जातीय और सामाजिक संरचना में गुजराती भोई समुदाय एक ऐसा समूह है, जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान, परंपराएँ और जीवन-शैली है। दिलचस्प बात यह है कि यह समुदाय स्वयं को राजपूत मूल का मानता है और मान्यता है कि उनके पूर्वज लखनऊ क्षेत्र से आकर गुजरात में बसे। समय के साथ उनकी संस्कृति में स्थानीय गुजराती रंग भी घुलते गए, लेकिन अपनी जड़ों की पहचान आज भी उनके रीति-रिवाजों और जीवन शैली में दिखाई देती है। ⸻ नौ उपजातियों में बटा एक समुदाय गुजराती भोई समाज कई उपसमूहों में विभाजित है, जिन्हें वे अपनी पारंपरिक नौ उपजातियाँ कहते हैं। ये हैं:  1. बकोरिया  2. भवटा  3. गधेडिया  4. गुडिया  5. कर  6. मच्छी या धीमर  7. माली  8. भेला  9. पुरबिया इन सभी उपजातियों की अपनी सामाजिक भूमिका, परंपराएँ और पारिवारिक नियम हैं। लेकिन समाज की एकता इन विविधताओं को खूबसूरती से जोड़ती है। ⸻ रोटी-बेटी के संबंध: सामाजिक नियमों की अनोखी बुनावट भारत के कई समुदायों में ‘रोटी-बेटी का व्यवहार’ सामाजिक रिश्तों का महत्व...

शहीद अगनू बिंद जी स्वतंत्रता संग्राम के उन वीर सेनानियों में से थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया

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  स्वतंत्रता संग्राम में चंदौली के अगनू बिंद का योगदान:16 अगस्त 1942 को अंग्रेज दरोगा से भिड़े; चंदौली जिले के धानापुर क्षेत्र के किशनपुरा गांव के स्वतंत्रता सेनानी अगनू बिंद की कहानी स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 16 अगस्त 1942 को सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ अगनू बिंद धानापुर थाने पहुंचे। लोग उन्हें प्यार से दादा कहते थे। उन्होंने थाने पर तिरंगा फहराने की मांग की। तत्कालीन अंग्रेज दरोगा अनवारुल हक ने इस मांग को ठुकरा दिया। इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई। दरोगा ने गोलियां चलवा दीं। इस गोलीबारी में हीरा सिंह की मौके पर ही मौत हो गई। अगनू बिंद ने दरोगा पर लाठी से हमला किया, जिससे दरोगा की मौत हो गई। आज भी किशनपुरा गांव में अगनू बिंद के वंशज रहते हैं। उनके प्रपौत्र बेचू बिंद का कहना है कि उनका परिवार अभी भी सरकारी सुविधाओं से वंचित है। हर साल 16 अगस्त को किशनपुरा के ग्रामीण अगनू बिंद का शहादत दिवस मनाते हैं।

घारुक (Gharuk) – संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय

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  घारुक (Gharuk) – संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय घारुक जाति/उपजाति का उल्लेख पुराने जातीय व जनगणना संबंधी ग्रंथों में कहार (Kahar) समुदाय की एक उप-श्रेणी (sub-caste) के रूप में मिलता है। उपलब्ध स्रोतों के आधार पर मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: 1. जातीय स्थान घारुक, कहार जाति के अंतर्गत माने जाते हैं। कुछ ग्रंथों में कहार को महर (Mahra) या धीवर/मल्लाह जैसी जल-आधारित जातियों से संबंधित बताया गया है। 2. ऐतिहासिक दावे एक अंग्रेज़ी स्रोत में स्पष्ट उल्लेख है कि “The Gharuk sub-caste of the Kahars, however, claim descent from the Kauravas.” अर्थात घारुक उपजाति अपने को महाभारत काल के कौरवों का वंशज मानती है। यह भी कहा गया है कि वे कुरुक्षेत्र में स्नान नहीं करते, जो एक विशिष्ट पारंपरिक मान्यता मानी गई है। 3. धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताएँ कहार समुदाय के कुछ वर्गों में जल-देवता ख्वाजा खिज़्र (Khwaja Khizr) की पूजा का उल्लेख मिलता है। यमुना क्षेत्र में ख्वाजा से जुड़ी मान्यताओं के साथ-साथ हनुमान की आराधना का भी वर्णन मिलता है। ये परंपराएँ क्षेत्र और समय के अनुसार भिन...